Sunday, June 30, 2013

मानव धर्म के हो ?



आप energizes जो पावर क्या है? श्वसन की प्रक्रिया के पीछे क्या रहस्य है? सब कुछ निर्भर करता है जिस पर महत्वपूर्ण ऊर्जा क्या है?

यही कारण है कि जीवन ऊर्जा मौखिक रूप से व्यक्त किया जा सकता है कुछ नहीं है, अभी तक यह सभी भाषाओं का स्रोत है. यह अदृश्य है, अभी तक यह हमें देखने में आता है. यह तर्क या दर्शन के माध्यम से जाना जाता है, अभी तक यह से कारण और स्मृति वसंत की शक्ति नहीं है. नहीं किया जा सकता यह हर एक की जा रही है और यह अनुभव में स्व है, इसे साकार, हमारे प्राकृतिक धरम, या मानव धरम ('मानव जाति की धरम') है.

मानव धरम एक की अपनी सहज क्षमता को साकार करने और अपने अंतिम स्तर तक इसे विकसित हो रहा है. यह पूरे ब्रह्मांड शामिल हैं जो आम बांड को साकार करने का मतलब है. यह सार्वभौमिक, अनन्त, कभी वर्तमान और बात है और मन से परे है. मनुष्य केवल शरीर andmind का एक तंत्र नहीं है, लेकिन अपनी truest अर्थों में आत्मा है. यह हम आत्मा में से एक हैं, कहा जाता है कि यही कारण है. वास्तव में आत्मा जीवन है और जीवन की भावना है. मानव धरम इसलिए सरल शब्दों में वाक्यांश में अभिव्यक्त किया जा सकता है "अपने आप को पता है!"

तो मानव हृदय और आत्मा के भीतर अनन्त कंपन का व्यावहारिक अनुभव जाति, समुदाय और क्षेत्र और फिर मानव धरम का अंतिम लक्ष्य है जो मानवता की ऊंचाई पर मानव पहुंचता की सीमा से मानव उत्थान होगा.

Tuesday, June 4, 2013

नेपाल का आश्रम हरु :-


१. श्री हंस आत्मबोध आश्रम, गौशाला-९, काठमाडौ केन्द्रिय कार्यालय फोन :- ०१-४४८७७११
२. श्री हंस क्रिति आश्रम चेत्रपुर, नारायणगढ चितवन             फोन :- ०५६-५२६५८७
३. श्री हंसयोग आश्रम बुटवल - ८                            फोन :- ०७१-५४८५२२
४. श्री सुयेश आश्रम आतारिया - ३, कैलाली                    फोन :- ०८१-५५०३१८
५. श्री हंस शान्ति आश्रम, रप्तिपुल  हेटौडा                      फोन :- ०५७-५२३३८२
६. श्री सदगुरु कृति आश्रम , बिरगंज पर्सा                      फोन :- ०५१-५३३५७८
७. श्री सत्य  साधना  आश्रम , इटहरी सुनसरी                  फोन :- ०२५-५८०३०८
८. श्री मानव  धर्म आश्रम , रानीपौवा तुल्सिघाट  पोखरा           फोन :- ०६१-५२४०१६
९. श्री हंस भिभू आश्रम, महेन्द्रनगर                           फोन :- ०८८-५२४६७८
१०. श्री श्रधेया आश्रम, धुलाबारी                               फोन :- ०२३-५६०७६६ 
११. श्री हंस सत्संग आश्रम, कृष्ण चोक, हरिवन                  फोन :- ०४६-५३०४२८
१२. श्री हंस सत्संग आश्रम, सुर्खेतरोड, नेपालगंज                 फोन :- ०८१-५५०९०७ 
१३. श्री राज राजेश्वोरी कृति आश्रम,नवलपरासी,कवासती          फोन :- ०७८-५४००३२

सिदार्थ गौतम बुद्ध ले भन्नुहुन्छ



मानिसहरु दश प्रकारको बन्धन अल्झेर छटपटाइ रहेका हुन्छन, ती यस प्रकारको छन् !
१)     म र मेरो भनि बेस्सरी समाती राख्ने
२)     नचाहिने शंका गर्नु
३)     अन्धविश्वास
४)     सुख भोगको आशा
५)     नराम्रो,बलियो द्रेष
६)     भौतिक पदार्थ को लालच
७)     नदेखिने बस्तुबारे आश गर्नु
८)     अहंकार म, मेरो भन्ने घमण्ड
९)     चंचलता, फुर्किनु
१०)अज्ञानता, थाहा नहुनु

विशेष दिब्य वाणीहरु



१)    जहाँ छन् जीव त्यहाँ छन् शिव
२)    निस्वार्थ कर्म गर, फल अवश्य पाउनेछौ
३)    बढी निन्द्रा र निन्दा त्यागी देउ
४)    सत्कर्म गर्नु , सत्य बोल्नु र सबैमा प्रेम गर्नु नै ईश्वरको पुजा हो
५)    कुनै मन्दिर र तिर्थस्थलहरुमा बलि नचढाऔ
६)    जन्मेको चिज नखाऊ उम्रेको पनि अमृत र बिष छुटाएर खाऊ
७)    मानिस मानवता भित्र रहेर मनुष्य हुन्छ,मानवताबाट गिरेर दनावमा परिणत हुन्छ र सत्य कर्म गरेर देवता पनि बन्न सक्छ
८)    हामी सबै प्राणी ईश्वरका श्रृष्टिमा समान छौ जातीय भेदभाव नगरौ
९)    जसले आफुले आफुलाई चिन्न सकेन र पाप कर्म गर्दै हिडिरहेको छ भने त्यसलाई कलियुग लागेको छ, जसले सदा सर्बदा सत्य कर्म र आफुलाई चिन्न सकेको छ भने त्यसको लागि सदा सर्बदा सत्य युग लागेको छ

: श्री सत्पल जी महाराज :



श्री सतपाल जी महाराज, Paramsant Satgurudev श्री हंस जी महाराज के पुत्र, हरिद्वार के पवित्र शहर में कनखल में 21 सितम्बर 1951 को हुआ था. उनके पिता का जीवन मानवता के लिए नि: स्वार्थ सेवा की और जागृति आदमी का निष्क्रिय आध्यात्मिकता के आदर्श के लिए अथक भक्ति के लिए किया गया था. अपने ही निहित प्रवृत्तियों के साथ संयुक्त एक प्रबुद्ध योगी के परिवार में पैदा होने के नाते, सतपाल जी महाराज के आध्यात्मिक विकास के लिए एक बहुत कम उम्र से शुरू कर दिया. दो साल की उम्र तक और आधे से वह पहले से ही ध्यान की लंबी अवधि के लिए बैठा था और वह दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके पिता एक बार उसकी चेतना स्वाभाविक रूप से अंदर की ओर खींचा, लेकिन दूसरों के हित के लिए बाहर तैयार किया जा रहा था कि यह टिप्पणी की. उसके माता - पिता की सख्त मार्गदर्शन के तहत, एक आध्यात्मिक वातावरण में बढ़ रहा है और महात्मा और भक्तों से घिरा हुआ है, वह बहुत जल्द ही आध्यात्मिक विज्ञान के एक मास्टर बन गया.

घर पर उसकी आध्यात्मिक शिक्षा के अलावा, वह सेंट जॉर्ज कॉलेज, Mussourie पर अपनी औपचारिक शिक्षा प्राप्त की. शुरू से ही सही वह विज्ञान में गहरी दिलचस्पी दिखाई. वह उद्देश्य विश्लेषण या व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से यह सत्यापित कर सकता जब तक प्रकृति द्वारा प्रैक्टिकल, वह कुछ भी स्वीकार नहीं होगा.

पूरी तरह से अपने ही गुरु को समर्पित करते हुए श्री सतपाल जी महाराज अपने जीवन में सेवा का रास्ता दिखा दिया. उनका जीवन उसी के लिए दूसरों को प्रेरित करने के लिए भी सेवा, समर्पण और का एक उदाहरण है. उनके पिता उनके सबसे बड़े पुत्र ने अपने मिशन और अधूरा काम वसीयत 19 जुलाई, 1966 में निधन हो गया. समय आ गया है, जब युवा महाराज जी ने अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए खुद को समर्पित, उसकी विशेषता उत्साह और दक्षता के साथ आदेश ले लिया. उन्होंने कहा कि श्री हंस जी महाराज, क्या कीमत कोई मायने नहीं रखता द्वारा सिखाया आदर्शों और पथ से भटक कभी नहीं किया है. दृष्टि की उनकी ईमानदारी और स्पष्टता, उसके महान चरित्र, आत्म - अनुशासन और रोगी प्रयास उसे समाज के सभी वर्गों का सम्मान अर्जित किया है.

श्री सतपाल जी महाराज एक बहु - आयामी व्यक्तित्व है. वह एक मानवतावादी, सामाजिक कार्यकर्ता, एक सुधारक और मानव जाति की सेवा के लिए एक वरदान है. लेकिन वह इस से भी अधिक है. वह मुख्य रूप से एक आध्यात्मिक वैज्ञानिक और एक प्रबुद्ध शिक्षक है. उन्होंने कहा कि समग्रता में जान लेता है और फिर समाज को बदलना होगा जो मानव चेतना में एक शांतिपूर्ण आध्यात्मिक क्रांति के बारे में लाना चाहती है. आदमी को समझाने और ब्रह्मांड को समझाने के लिए अपने जीवन के आदर्श वाक्य है.

सम्पर्क


नेपाल मानव धर्म सेवा समिति 

सुर्खेत रोड, नेपालगंज बाँके

फोन :081-550907
वेब :   http://nmdssnpj.blogspot.com/

ई-मेल :nepalgunjashram@gmail.com

Monday, June 3, 2013

दिब्य उपदेश



जीवभित्र नै आत्मा हुन्छ,र आत्मा भित्र नै परमात्माले बास गर्छन,मन नै मन्दिर हो मन मन्दिरलाई पबित्र गराई परमात्मा बसाउने आसन बनाउ यसबाट नै तिमीहरुलाई शक्ति र आनन्द मिल्नेछ हरेक प्राणीमा परमात्मा परमेश्वरको दर्शन पाउनेछौ,ब्रह्माण्डमा जे जति श्रृष्टि भएका छन् ति सबै ईश्वरकै श्रृष्टि हुन् , त्यसैले मैले कुनै पनि जीवको रगत मासु खाने त सोच्दै न सोचौ,प्राणीहरुलाई अलिकति कष्ट भएको देख्न सक्दिन,माताजी भन्नुहुन्छ कुनै पनि देवी देवताले बलि खाएको छैन,त्यसैले कुनै पनि मन्दिरमा निरिह प्राणीको बध गरेर पाप नबोक तिमीहरुले गरेको त्यो हत्या,हिंसा र देवी देवताले खान्छन भनेर चढाएको रगत मासु सडेगलेको चिजहरुबाट मन्दिर छाडेर जानु पर्ने हुन्छ,तर ईश्वर रोएको छटपटिएको कसले सुन्ने ? तिमिहरुले के लिएर आएका थियौ,के लिएर जान्छौ
केवल पाप र पुण्य मात्र साथमा जान्छ, असहाय गरिब दिन दु:खिलाई हेला नगर तडपिएका आत्माहरुमा ईश्वरको बास हुन्छ,उपकार के हो ? जन्म किन लियौ,शान्ति कसरी प्राप्त गर्ने ? सु:खी कसरी बन्ने जस्ता उपयोगी हृदयस्पशि ज्ञानको वर्षा दिइ रहनुभएको छ !